इंसान है पत्ते कि तरह

 इंसान है पत्ते कि तरह

इंसान जबसे सामाजिक बंधन मे बधे है तभी से समाज को बेहतर तरीके से चलाने के लिए बिभिन्न नियम क़ानून बनाये गये है। Society को सही दिशा मे चलाने के लिए बिभिन्न तरतरीका अपनाये गये है। समाज जितना आगे बढ़ते गये उतना ही बिभिन्न बिचार, अंधबिस्वास और कुरीतियाँ बढ़ते गये।

समाज को सही दिशा मे आगे बढ़ाने के लिए समय समय पर बिभिन्न महामानब ईस धरती मे पैदा हुए है। उन महामानब समाज कि भलाई के लिए और समाज को सच्चाई से अबगत कराने के लिए अथक प्रयास किए है। समाज मे बढ़ते हुए बिभिन्न अपराध और अंधबिस्वास ने मानब जीबन को दूषित, कलुषित कर चूका है। मुझे लगता है मानब को सच्चाई से अबगत होना चाहिए। मै ईस amazing poetry मे प्रकृति कि नियम क़ानून के बारे मे बताने कि प्रयास किया है। समाज मे बढ़ते बिभिन्न अपराध या लोगो का जमाखोरी करनेका प्रबनता प्रबल रूप से बढ़ रहे है।

और जमाखोरी करने कि आदत ने लोग दूसरे को मदद करने कि प्रबनता को भूल रहे है। आज के समय मे लोग बहुत जायदा ब्यस्त हो चूका है। और ईस भागम भाग जीबन मे लोगोंको humanity कि ओर बढ़ाने के लिए सच्चाई से अबगत कराना जरुरी हो गया है। समाज मे सामूहिक शांति ब्यबस्था को बनाये रखने के लिए हम लोगो को उन महामानब का बातो को मूल्यांकन करना अति आबश्यक हो गया है।


इंसान है पत्ते कि तरह
आते है इंसान पत्ते कि तरह,
जाते है इंसान पत्ते कि तरह।
इंसान है पत्ते कि तरह,
बिखर जाये पत्ते कि तरह।
बनते है रिस्ता दो धागो मे,
एक टूट जाये तो दूसरे भी टूट जाय।
सदिओं पुरानी बात है ऐसा,
आज भी है जैसा कि तैसा।
हजारों महात्मा ने सन्देश दिए है ऐसा,
इंसान है पत्ते कि जैसा।
युगो युगो से रित चली आए,
जोड़ तोड़ कर रिश्ता बनाये।
कहे तरुबर सुनो भाई एक बात,
एक आता है एक जाता है यही है सचबात।
दोस्ती नाता सब फीका है,
समय के साथ सब जरुरत है।
रिश्ता नाता सब जोड़ा है,
समय के साथ सब मिले है।
मा का लाडला बेटा है,
पल मे वह छोड़ चले है।
अच्छा खासा पिंजरा छोड़ चले है,
माया मोह, रिश्ते नाते सब त्याग चले है।
यही बात ज्ञानिओ ने समझायें है,
इंसान पत्ते कि तरह है।
कुछ तो यहाँ लूट मचाये,
कुछ तो यहाँ शोर मचाये,
कुछ तो यहाँ साम्राज्य बनाये,
कुछ तो यहाँ अपना मर्जी चलाये,
सब रह गए धरा के धरा,
बहुतो का इच्छा रह गए अधूरा।
कोई तो यहाँ शान से जिए,
कोई तो यहाँ अपना नाम किए,
कोई तो ऐसा काम किए,
कई तीनो लोको मे नाम किए,
किसीने खूब मजे किए,
किसीने खूब राज चलाया
कोई तो अपना डंका बजाया,
कोई तो अपना इतिहास बनाया।
कोई तो ऐसा कांड किए,
दुनिया मे बहुत उथल पुथल किए
समझदार ने बहुत समझायें
इंसान है पत्ते कि जैसा।
किसीका मन मे घमंड भरे है
कोई तो बड़ा घमंडी बने है।
कोई तो बड़ा लालची बने है,
एक से बढ़कर एक भ्रस्टाचारि बने है।
बहुतो ने जाल बिछाया,
वह संसार मे अपना रुतबा दिखाया।
किसीने यहाँ धूम मचाये,
कोई तो यहाँ शाख बनाये।
कइयों यहाँ चक्रबर्ती सम्राट हुए,
बहुतो ने बहुत बड़ा मालदार हुए,
सब के सब यही के रह गये,
खाली हाथ आये थे खाली चले गये।
कई तो यहाँ गुलाम बनाये,
हजारों नौकर चाकर बनाये,
किसीको कुछ हाथ ना लगा,
लाखो करोड़ो ने गुलामी झेला,
संत, महात्मा ने बताये ऐसा,
इंसान है पत्ते कि जैसा।
जैसा पत्ते टूट जाते है जोड़ा ना लगे फेर
बैसा ही जो चले जाते है राखे ना कोई खेर।


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